Followers

Monday, August 05, 2013

USKE JEEVAN KA EK PANNA...../ उसके जीवन का एक पन्ना …





Pahadi ilake ke sannate ko cheerti hui ek awaz lagatar uske kano se takra rahi thi. Use bhor ka intzar tha ,usi ke intzar mein wo raat ke antim prahar se hi shawl odhkar us baans ke bench par baithi hui thi..Door door tak faile gahan andhere mein tim tim jalte- bujhte peele- narangi saikdon bulb ek adbhut manoram drishya ka srijan kar rahe the...shayad roz karte hain par usne toh aaj hi dekha na.
Is manoram drishya se uska man atmavibhor ho utha tha... aisa lag raha tha mano kisi ne darakhton ko taron se jadi dushala odha di ho. Saalon se dabe uske swar mano betab ho uthe the uske kanth se unmukt ho labon pe sajne ke liye.


Achanak uski nazar padi halke narangi aasman par, stabdh rah gayi. Bhor hone ka agaz itna sundar, itna nishabd !! Haan wo teekhi surili dhun abhi bhi moujood thi, pahadi jhinguron ki awaz.Yahan shahar mein bhi ek adh jagah gate honge koi gana par vyast jeevan ki ast-vyastata mein kho jati hain unki dhunein...


Awak, hataprabh wo dekhti rahi 'uske' tilasm ko, wo bikherta gaya kanchanjangha ke lalat par apni abha , aur mugdh nainon se niharti wo us pal ko camera mein kaid karna bhi bhool gayi. Jis suraj ki tapish se use ghrina thi aaj usi suraj se use prem ho gaya tha, gabhir prem.Mantramugdh si dekhti rahi, narangi se laal,phir narangi, phir sunhara aur phir pahad ke shikhar ke peeche se avatarit hota hua surya … adbhut !! Kya ise swarg ki upalabdhi nahin kah sakte? Jannat hi to hai ye....Samay mano tham gaya ho, shayad jahan karishme hote hain wahan samay ka koi astitva nahin hota.


Par dhara pe abhi bhi andhera tha.Roshni apna samay lekar ayegi dhara ko snan karane.Isi beech ek rang birangi titli bench ke ek kone par aa kar baith gayi .Use laga mano kah rahi ho,"kaun ho tum? Meri jagah pe kyon baithi ho?"
Ek pal mein hi mano kahin se bachpan ka alhadpan laut aya, jhat se us titli ko pakda, aur doobne lagi uske rangon mein.


Yaad aa gayi use bachpan ki wo shaitani jab keemti water colour ke tube se rang nikalkar do panno ke beech bikher deti thi aur panno ko thodi der tak kisi kitaab ke niche rakh deti thi ,thodi der baad kitaab ke niche se panno ko nikalkar dekhti thi apna srijan .Isi tarah vibhinna aakar aur rangon ki titliyan banakar apni scrapbook bhara karti thi. Aaj inhi rangon se jeevan ko dobara bharne ka mauka mila hai...

"Memshaab coffee"
Us waqt isse zyada madhur shabd koi aur ho hi nahin sakte the. Rango mein dooba man aur coffee ka saath, isi ko to sukh kahte hain, jo kshanbhanghur hota hai.Titli ko usne azaad kar diya, par titli use tohfa dekar gayi thi. Mahakte hue kuch rang, uske hatheli pe.Kuch kaha bhi hoga par wo samajh nahin payi hogi.Shayad kaha hoga in rangon se apne liye ek indradhanush bana lena.Ya aisa kuch -' sambhal ke rakhna in rangon ko apne rumal mein.Jab man udaas ho aur ankhon mein aansoon to isi rumal se ansuon ko ponchna. Rang wapas laut ayenge jeevan mein...'


Pahadi dhoop ki tapish bhi asahniya hoti hai. Din chadh aya tha, vastavikta mein lautne ka waqt tahara nahin rahta.Usne ek baar aur Kanchanjangha ki or dekha aur waida kiya ki phir ayegi apne jeevan ke kuchh pal sanjha karne. Uski zindagi in palon ka sahara lekar har ik utar chadhav ka saamna kar legi.




पहाड़ी इलाक़े के सन्नाटे को चीरती हुई एक आवाज़ लगातार उसके कानों से टकरा रही थी. उसे भोर का इंतज़ार था ,उसी के इंतज़ार में वो रात के अंतिम प्रहर से ही शॉल ओढकर उस बाँस के बेंच पर बैठी हुई थी..दूर दूर तक फैले गहन अंधेरे में टिम टिम जलते- बुझते पीले- नारंगी सैकड़ों बल्ब एक अद्भुत मनोरम दृश्य का सृजन कर रहे थे...शायद रोज़ करते हैं पर उसने तो आज ही देखा न....इस मनोरम दृश्य से उसका मन आत्मविभोर हो उठा था... ऐसा लग रहा था मानो किसी ने दरख्तों को तारों से जड़ी दुशाला ओढ़ा दी हो. सालों से दबे उसके स्वर मानों बेताब हो उठे थे उसके कंठ से उन्मुक्त हो लबों पे सजने के लिए.


अचानक उसकी नज़र पड़ी हल्के नारंगी आसमान पर, स्तब्ध रह गयी. भोर होने का आगाज़ इतना सुंदर, इतना निशब्द !! हाँ वो तीखी सुरीली धुन अभी भी मौजूद थी, पहाड़ी झींगुरों की आवाज़.यहाँ शहर में भी एक आध जगह गाते होंगे कोई गाना पर व्यस्त जीवन की अस्त-व्यस्तता में खो जाती हैं उनकी धुनें...


अवाक, हतप्रभ वो देखती रही 'उसके' तिलस्म को, वो बिखेरता गया कांचनजंघा के ललाट पर अपनी आभा , और मुग्ध नैनों से निहारती वो उस पल को कैमरे में क़ैद करना भी भूल गयी. जिस सूरज की तपिश से उसे घृणा थी आज उसी सूरज से उसे प्रेम हो गया था, गभीर प्रेम....मंत्रमुग्ध सी देखती रही, नारंगी से लाल,फिर नारंगी, फिर सुनहरा और फिर पहाड़ के शिखर के पीछे से अवतरित होता हुआ सूर्य...अद्भुत !! क्या इसे स्वर्ग की उपलब्धि नहीं कह सकते? जन्नत ही तो है ये....समय मानों थम गया हो, शायद जहाँ करिश्मे होते हैं वहाँ समय का कोई अस्तित्व नहीं होता.


पर धरा पे अभी भी अंधेरा था.रोशनी अपना समय लेकर आएगी धरा को स्नान कराने.…
 इसी बीच एक रंग बिरंगी तितली बेंच के एक कोने पर आ कर बैठ गयी .उसे लगा मानो कह रही हो,"कौन हो तुम? मेरी जगह पे क्यों बैठी हो?"एक पल में ही मानो कहीं से बचपन का अल्हड़पन लौट आया, झट से उस तितली को पकड़ा, और डूबने लगी उसके रंगों में. याद आ गयी उसे बचपन की वो शैतानी जब कीमती वॉटर कलर के ट्यूब से रंग निकालकर दो पन्नों के बीच बिखेर देती थी और पन्नों को थोड़ी देर तक किसी किताब के नीचे रख देती थी ,थोड़ी देर बाद किताब के नीचे से पन्नों को निकालकर देखती थी अपना सृजन… इसी प्रकार विभिन्न आकार और रंगों की तितलियाँ बनाकर अपनी स्क्रैपबुक भरा करती थी. आज इन्ही रंगों से जीवन को दोबारा भरने का मौका मिला है...


" मेमशाब , कॉफी "
उस वक़्त इससे ज़्यादा मधुर शब्द कोई और हो ही नहीं सकते थे. रंगो में डूबा मन और कॉफी का साथ, इसी को तो सुख कहते हैं, जो क्षणभंघुर  होता है.तितली को उसने आज़ाद कर दिया, पर तितली उसे तोहफा देकर गयी थी. महकते हुए कुछ रंग, उसके हथेली पे. कुछ कहा भी होगा पर वो समझ नहीं पाई होगी.शायद कहा होगा इन रंगों से अपने लिए एक इंद्रधनुष बना लेना.या ऐसा कुछ - ' संभाल के रखना इन रंगों को अपने रुमाल में.जब मन उदास हो और आँखों में आँसूं तो इसी रुमाल से आँसुओं को पोंछना. रंग वापस लौट आएँगे जीवन में...'


पहाड़ी धूप की तपिश भी असहनिय होती है. दिन चढ़ आया था, वास्तविकता में लौटने का वक़्त ठहरा नहीं रहता. उसने एक बार और कांचनजंघा की ओर देखा और वायदा किया कि फिर आएगी अपने जीवन के कुछ पल सांझा करने. उसकी ज़िंदगी इन पलों का सहारा लेकर हर इक उतार चढ़ाव का सामना कर लेगी.



Kangchenjunga ( कांचनजंघा )
Mountain
Kangchenjunga is the third highest mountain in the world. It rises with an elevation of 8,586 m in a section of the Himalayas called Kangchenjunga Himal that is limited in the west by the Tamur River and in the east by the Teesta River. Wikipedia


34 comments:

  1. आपने लिखा....
    हमने पढ़ा....और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए बुधवार 07/08/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in ....पर लिंक की जाएगी.
    आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    लिंक में आपका स्वागत है .
    धन्यवाद!

    ReplyDelete
    Replies
    1. अत्यंत रोचक कहानी .... !

      Delete
  2. Replies
    1. Thank you Chirasree. Much appreciated

      Delete
  3. Replies
    1. thank you for the encouraging words di.. means a lot to me

      Delete
  4. Replies
    1. शुक्रिया शोर्य जी

      Delete
  5. इस कहानी से बहुतों की उलझने सुलझ जाएगी
    शुक्रिया छोटा पड जाएगा

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपकी टिपण्णी ने मेरा उत्साह और अधिक बढ़ा दिया है। अपना स्नेह और आशीर्वाद बनाये रखियेगा विभा जी

      Delete
  6. bahut acha likhti hai aap.. subha ban gayi apka blog padke :) thanks for sharing

    ReplyDelete
    Replies
    1. aapka bohat bohat shukriya Shetall ji. this beautiful comment has made MY day..

      Delete
  7. Tumhara yeh panna tumne behad khubsoorati se sajaya hai .... lekhni ko sanjoye rakho ... kabhi yehi sab baaten jeevan ka dharohar ban jata hai !

    ReplyDelete
    Replies
    1. bohat bohat shukriya Ananya ji..must say you write so beautifully Ananya..and you are right, my 'me' is at its best when i am with my words...
      Thank you for taking the time to read my blogposts.
      Regards

      Delete
  8. प्राकृतिक छटा का सुन्दर अवलोकन
    बहुत सुन्दर लेख़ ''अपर्णा'' जी

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपको मेरी रचना अच्छी लगी जानकार बेहद ख़ुशी हुई

      Delete
  9. Great post! Your Hindi is Awesome! Keep it ignited!

    http://www.gudbe.com/inspirational-thoughts-the-secret-of-success/

    Mamta Sharma

    ReplyDelete
    Replies
    1. Thank for the kind and encouraging words Mamta..God bless

      Delete
  10. अद्भुत चित्रात्मक प्रस्तुति .. मन कहीं उन्हीं नज़रों में खो सा गया ... वाह !
    आपकी इस उत्कृष्ट रचना की प्रविष्टि कल रविवार, 15 सितम्बर 2013 को ब्लॉग प्रसारण http://blogprasaran.blogspot.in पर भी... कृपया पधारें ... औरों को भी पढ़ें |

    ReplyDelete
    Replies
    1. उत्साहवर्धन के लिए आपका दिल से आभार शालिनीजी। साँझा करने के लिए धन्यवाद।

      Delete
  11. सुंदर वर्णन !

    ReplyDelete
    Replies
    1. अनिता जी आपका तहे दिल से शुक्रिया।

      Delete
  12. ब्लॉग प्रसारण लिंक 11 - उसके जीवन का एक पन्ना [अपर्णा बोस]

    बहुत ही सुन्दर खूबसूरत वर्णन पहाड़ों को आपने जाना पहचाना महसूस किया है पढ़कर ऐसा लगता है आपने उनके साथ जीवन जिया है बहुत बहुत बधाई

    ReplyDelete
    Replies
    1. जी बिल्कुल सही कहा आपने अरुणजी । मेरा बचपन प्राकृतिक सौंदर्य और प्रदूषण से रहित वातावरण के बीच गुज़रा है.असम ,शिलोंग, चेरापूंजी ,अरुणाचल आदि मेरे जीवन का एक अहम हिस्सा थे और रहेंगे। इस लेख की प्रेरणा मुझे पहाड़ों ने ही दी है ,पश्चिम बंगाल में 'रिश्यप (Rishyap )' नामक एक हिल स्टेशन है जहाँ से आप कांचनजंघा देख सकते हैं। तीन बार जा चुकी हूँ फिर भी मन पूरी तरह से भरा नहीं है…

      Delete
  13. Replies
    1. शुक्रगुज़ार हूँ साधना जी

      Delete
  14. बहुत रोचक और आनंद दायक

    ReplyDelete
  15. Aparanaji,
    Ap nishchay hi bhut achchaa likhti hai .Par aj kal mai baahra aie hu is liye aap ke lekha padha nahI paati.
    vinnie

    ReplyDelete
  16. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण शब्द चित्र...

    ReplyDelete

SOME OF MY FAVOURITE POSTS

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...