Followers

Sunday, July 29, 2012

DIL KI BAAT / दिल की बात .................


सुबह शाम 
गूंजे मधुर शब्द 
मनोकामना .
subah sham
goonje madhur shabd
manokamna

द्वेष क्लेश क्यों ?

मन देवालय है
श्रेष्ठ रचना.

dwesh klesh kyon?

man devalaya hai
shreshth rachna

ऋतु वर्षा की

ह्रदय म्लान तव ?
भाव स्वच्छंद .

ritu varsha ki

hriday mlaan tav?
bhaav swachchand

मोती चुन ले

खज़ाने से अपने
काव्य में पिरो.



moti chun le

khazane se apne
kavya mein piro

कलम उठा

मिसरा बुन कोई
गज़ल बना .

kalam utha

misra bun koi
gazal bana

दिल की बात

दिल तक पहुँचे
ज़िम्मेदारी है .

dil ki baat

dil tak pahunche
zimmedari hai

अपने सब

गुणी परिवार में
भय ये कैसा ?

apne sab

guni parivaar mein
bhay ye kaisa

उलाहना दें

या मिले सराहना
नम्र आभार .

ulahna de

ya mile sarahna
namra abhaar

BHARATVAASI AAJ BHI APNE HAATHON SE KHATE HAIN / भारतवासी आज भी अपने हाथों से खाते हैं .......

"अतिथि भगवान का रूप होता है , अपनी क्षमतानुसार उसकी आव-भगत करो "

भारत के किस परिवार में ऐसा नहीं सिखाया जाता है ?आज यही सीख हम भारतवासियों के लिए अपमानजनक  बन गयी.आप सबको ज्ञात होगा , अभी पिछले महीने ही अमरीकी महिला ओपराह विनफ्री भारत भ्रमण पर आयीं  थीं . उनका उद्देश्य बुरा नहीं था,आज के भारत की  एक छवि अपने अमरीकी दर्शकों के समक्ष रखने के लिए कुछ तथ्य संग्रह करने ही आयीं थीं .पर उन्होंने एक कुरुचिपूर्ण मंतव्य कर हम देशवासियों के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाई है .यहाँ से अपने देश लौट कर वह उक्ति करती हैं कि "भारतवासी आज भी अपने हाथों से खाते हैं!!"
ज़्यादातर विदेशियों की हमारे देश के बारे में यही धारणा है कि हमारी जनसँख्या का बड़ा हिस्सा गरीब है और बस्तियों में रहता है.हमारे देश में सबसे ज़्यादा भिखारी हैं.आज भी भारत का परिचय देते वक्त वो कहतें हैं कि इस देश में बंदरों का नाच दिखाकर और सांपों को बीन की  धुन पे नचाकर लोग जीविका उपार्जन करते हैं.बात काफी हद तक सच है ,परन्तु भारत का ये सिर्फ एक पहलू है .विशाल समुद्र में बूँद जैसा.हमारे देश में जितने वर्ण ,जाति,समुदाये ,और भाषा के लोग बसते हैं शायद ही और कहीं हो  या यूँ कहूँ है ही नहीं .हर एक प्रान्त में कई धर्म एवं भाषा के लोग एकसाथ रहते हैं.विविधता में एकता यही तो हम भारतवासियों की  खूबी है.परन्तु इन विदेशियों को तो आदत है हमारी हर अच्छी बात को नज़रंदाज़ करने की .
Danny Boyle ने कुछ दो एक वर्ष पहले एक फिल्म बनाई थी , Slumdog Millionaire.उन्होंने भी भारत के उस रूप का चित्रण किया जो गरीब है,पैसे कमाने के लिए बच्चों को जानबूझ कर भिखारी बना देता है,नाबालिग लड़कियों को गन्दी गलियों में व्यवसाय करने के लिए मजबूर करता है ,इत्यादि .एक फिल्म हमेशा जीवन के सच्चाई से प्रेरित होने के बावजूद ,अतिशयोक्ति का सहारा लेकर ही अपनी कहानी दर्शकों तक पहुंचाता है.पर ओपराह ने जो दिखाया वो चलचित्र नहीं था,भारत का चित्रण था.कोई हक नहीं बनता किसीका भी की  हमारी भावनाओं  को ठेस पहुंचाए.उनके आवभगत में पूरा बॉलीवुड शामिल था,बड़े से बड़े उद्योगपति ,पत्रकार ,लेखक प्रत्येक ने अपना सम्मान और प्यार उनको दिया.इस प्रेम का उन्होंने तिरस्कार किया और वो भी इतने बुरे ढंग से .
उनका वक्तव्य मूलतः मुंबई के उस हिस्से पर आधारित था जो १०/१० के कमरे में रहता है.उनको ये नहीं दिखा कि १०/१० के कमरे में रहने वाला परिवार कितना सुखी है.उसके पास टीवी है ,मोबाईल फोन है ,बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ते हैं.टीवी पर मैंने जो देखा उसके अनुसार ओपराह एक बारह वर्षीय लड़की से कहती हैं कि उसकी माँ जो कह रही है उसका अर्थनिरूपण(interpretation) करे.माँ से जो प्रश्न वह पूछ रहीं थीं उसमे उनके दांपत्य जीवन से जुड़े प्रश्न भी थे.क्या यही है एक उन्नत देश के नागरिक की  शिक्षा?
मुंबई के चौल में रहने वाले लोग ही समूचे भारतवर्ष का असली परिचय नहीं हैं .और यदि हैं भी तो हमें तो इस बात पे ना तो कोई आपत्ति है और ना ही कोई परेशानी.बच्चा चाहे जैसा भी हो , माँ को सदैव अपना ही बच्चा ज़्यादा प्यारा लगता है.वह खुद चाहे कितना भी डांटे या मारे , यदि कोई दूसरा ऐसा करे तो तुरंत अपने बच्चे का पक्ष लेती है .और प्रत्येक संतान के पास उसकी अपनी माँ ही  विश्व की  सबसे सुंदर स्त्री होती है.हम भारतवासियों के साथ भी ऐसा ही है.हमारी भारत माँ जैसी भी है हमें प्राणों से भी प्यारी है.किसी को यदि हमारी माँ सुंदर नहीं लगती तो ना आये हमारे घर,ग्रहण ना करे हमारे घर का अन्न जल.पर ये कैसा शिष्टाचार,की आदर सत्कार के साथ उन्हें हमने घर में पनाह दी,उन्होंने अपना कार्य सम्पूर्ण किया और अपने देश लौट कर हमारे ही संस्कारों की चर्चा करें !!ये हमारी सहिष्णुता और विनम्रता जैसे गुण ही हैं जो हमने इस बात की इतिश्री कर दी .
हम अपने हाथों से खाते हैं , उन्हें आपत्ति है तो छूरी कांटे से खाएं .हमारे देश में माँ के हाथों से खाना खाने के लिए लोग तरस जाते हैं,माँ एक कौर खिला दे तो दिन अच्छा गुज़रता है ,ऐसा कई लोग मानते हैं.पर हम इन विदेशियों को क्यों समझाएं ये सब.हम भी अगर चाहें तो उनके संस्कारों की आलोचना कर सकते हैं , पर हमारा ज़मीर किसी प्रकार के कुत्सित मंतव्य का अधिकार नहीं देता .जिस देश की  वो नागरिक हैं वहाँ तो एक समय ऐसा भी था जब त्वचा के रंग के आधार पर चरम भेदभाव किया जाता था.ज़ाहिर है उन्होंने खुद और उनके समुदाये के लोगों ने तिरस्कार सहा  हो.हम भारतवासी आज भी ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में गोरों के हाथों अपमानित होते हैं.कई लड़कों का खून तक हुआ है इस वजह से.पर हम इस मुद्दे को लेकर ज़्यादा सोचते ही नहीं हैं.अप्रासंगिक है ,पर कहना ज़रूरी है.हम खुद कितना साफ़ या गोरे रंग के भक्त हैं ये तो विज्ञापनों को देखकर पता चल ही जाता है.आजकल लड़के भी गोरेपन की साज सामग्रियों  का इस्तेमाल करने लगें हैं.विज्ञापन में दिखाते हैं कि गोरी लड़की के लिए नौकरी पाना या योग्य वर मिलना एक सांवली  लड़की से ज़्यादा आसान है.ऐसा मैंने सुना भी है कि अपने अप्रगुण(inefficiency) को गोरे रंग की आड़ में रख कई महिलायें अच्छे से अच्छे ओहदे पर टिकी भी  हुईं हैं .पर इन छोटी छोटी बातों को नज़रंदाज़ कर आगे बढ़ना ही भारत जैसे विशाल देश के लिये शोभायमान है .हमारे संस्कार ,हमारी आदतें हम किसी बाहर वाले के डर से बदल तो नहीं सकते.उन्होंने भारत की ऐसी तस्वीर सम्पूर्ण विश्व को दिखाकर पैसे भी कमा लिए और शोहरत भी हासिल कर ली,पर भारत का जो हिस्सा उनसे मोहब्बत करता था उनके विश्वास को ठेस पहुँचाया है.ईश्वर उन्हें सदबुद्धि दे,वरना हमारे द्वार तो सदैव खुले ही हैं, हम तो फिर उनका ऐसा ही आदर सत्कार करेंगे.हमारे संस्कार हमें यही सिखाते हैं कि दुश्मन यदि खुद चलकर तुम्हारे पास आये तो कम से कम एक गिलास पानी उसके समक्ष ज़रूर रखो .काश उन्होंने कभी हम भारतियों का खाना अपने हाथों से खाकर देखा होता !!


Saturday, July 28, 2012

PRAKRITI / प्रकृति....................

Mand mand gati se
balkhati itrati
ayee mere kamre mein
hawa khushbu bhari

Bauraye mast hathi jaise
soond hilate
rang hai nyara hara
ped aur unki dalein

Kali ghata ke aad se
tiptipati jhanjhanati
hriday ullasit kare
varsha ki saugaat

Sikhati bade prem se
mayawini sundari
greeshm,varsha,sheet
dhara apne niyam
____________________

मंद मंद गति से
बलखाती इतराती
आयी मेरे कमरे में
हवा खुश्बू भरी

बौराये मस्त हाथी जैसे
सूँड हिलाते
रंग है न्यारा हरा
पेड़ और उनकी डालें

काली घटा की आड़ से
टिपटिपाती झनझनाती
हृदय उल्लसित करे
वर्षा की सौगात

सिखाती बड़े प्रेम से
मायाविनी सुंदरी
ग्रीष्म,वर्षा,शीत
धरा अपने नियम

Wednesday, July 25, 2012

'SWAPNO' - AMADER PRIYO BOHURUPI........ / 'স্বপ্ন' আমাদের প্রিয় বহুরূপী

Chaina mukh dekhte
tobu roj ashe
anahuter moton
anorgol katha bole jaye
biroktikor......
or nishwas proshwash
ashojjhokor
jara chaichhe oke,shekhane jak......................

Ami tyag korechhi oke
anekdin holo
ki notunatwo achhe or?
Shei hanshabe
hanshiye kandabe
roudrer por bristi
bristir por jhor
ami chine giyechhi,abhinoy thak........................

Parichoy tar?Chenona?
Amader shobar priyo bohurupi ,'Swapno'..........
___________________________________________

চাইনা  মুখ দেখতে
তবু রোজ আসে
আনাহুতের মতন
অনর্গল কথা বলে যায়ে 
বিরক্তিকর ......
ওর নিশ্বাস প্রশ্বাস
অসজ্ঝকর 
যারা চাইছে ওকে,সেখানে যাক......................

আমি ত্যাগ করেচ্ছি ওকে
অনেকদিন হোলো 
কী নতুনত্ব আচ্ছে ওর?
সেই হাঁসাবে 
হাঁসিয়ে কাঁদাবে 
রৌদ্রের পর বৃষ্টি 
বৃষ্টির পর ঝড়
আমি চীনে গিয়েছি,অভিনয় থাক........................

পরিচয় তার?চেননা ?
আমাদের সবার প্রিয় বহুরূপী ,'স্বপ্ন'..........


KALE DHOONYE MEIN HUM TUM.... / काले धूएँ में हम तुम.…



Nikli thi main apne dil ko bahlane
halki barish ki bauchhar mein
mitti ki saundhi khushboo liye
sapnon ki tashtari liye

Socha chalo tod laoon aaj
thodi si chaandni apne liye
tumhare liye thoda sa aasmaan
aur sajaa loon apna jahan

Taron se achchadit hai dhara
timtimate jaise angoor ke guchche
man kiya unhe bhi tod laoon
meethi neend mein so jaoon

Gaganchumbi imaraton ki mahfil
shor sharaba,kaisi bhaagdaud
(par ) bijli ke taron mein chaand gum
aur kale dhoonye mein hum tum.... 

निकली थी मैं अपने दिल को बहलाने
हल्की बारिश की बौछार में
मिट्‍टी की सौंधी खुश्बू लिये
सपनों की तश्तरी लिये

सोचा चलो तोड़ लाऊँ आज
थोड़ी सी चाँदनी अपने लिये
तुम्हारे लिये थोड़ा सा आसमान
और सजा लूँ अपना जहान

तारों से आच्छादित है धरा
टिमटिमाते जैसे अंगूर के गुच्छे
मन किया उन्हें भी तोड़ लाऊँ
मीठी नींद में सो जाऊँ

गगनचुंबी इमारतों की महफिल
शोर शराबा,कैसी भागदौड़ 
(पर ) बिजली के तारों में चाँद गुम
और काले धूएँ में हम तुम..... 

Monday, July 23, 2012

'YOU CANNOT HAVE BEST OF BOTH THE WORLDS'


Had a conversation with the sky.
Told him , I am powerless to fathom
the secret of his vastness and bounty .
Asked him,is not he proud?

He had a similar query in his eyes.
He had tried to guage the deepness,
the sea of love in my heart’s core
but the mystery was covered in a shroud

I told him , I wanted to feel the line
I could spot far away in the horizon,
point where sky merged with the trees,
the moment when sun summoned the cloud

I yearn for those wings for I want to soar
sit amid the moon and stars above.
I want to weave the virtual and surreal
and merge with the real clear and loud

Sky, as clever as his vastness avowed,
‘you cannot have best of both the worlds.
Love what you have in your fist
and long for what is yours never to be’………..


Saturday, July 21, 2012

NEWSPAPER


THEN-Hope my letter finds you in pink of health and cheer…..

NOW-Hope this message or this mail or this sms or……………

Letters ,postcards,registered letters etc are gradually striding towards the fate of the telegrams and STDs. How many of you know about trunk calls ? OMG, if my son reads this he is going to relegate me to the times of the cavemen!!
Just one thing has survived in the face of this booming technology – ‘NEWSPAPER’.
The charm of this entity has not faded even by an iota over so many years and that is so wonderful . Most of us still want our newspapers ,crispy and fresh,first thing in the morning ,over a cup of tea or coffee.Newspapers have survived the battle with electronic media because they have numerous plus points . The greatest anvantage being the flexibility which it brings with itself . The idiot box will not telecast the news bulletin at our convenience but our newspaper listens to us.We can read it whenever we want to and also stack the old ones ,use some cuttings from them for projects and collage.
Its true that all the leading newspapers have their respective websites but other than the journos and other media professionals how many of us really feel the urge to read a news bulletin on a computer screen?Well ,even the younger lot appreciates the resourcefulness and worth of the print media out of an assortment of means of communication accessible by them
I am pretty confident that newspapers are never going to meet the fate of the Dinosaurs.

Thursday, July 19, 2012

MERE KHWAABON KI BASTI / मेरे ख़्वाबों की बस्ती .......

Mere khwaabon ki basti ka soonapan door ho jayega
tere chhoone se mera khwaabgaah mashhoor ho jayega

Jin raaston se hum wakif  thhe , wo nazar ate hi nahin
tu saath chale to nayi raah ka patthar kohinoor ho jayega

Ummeed ka daaman nahin chhoda hai maine abhi tak
tu bhi sahra paar jane ke liye majboor ho jayega

Kahan socha tha hamne jab mohabbat ka izhaar kiya tha
ki jannat-e- ishq mein gum hona kasoor ho jayega

Paak mohabbat ki dua mein ek ajeeb si kashish hai
meri bekasi ka aalam aaj zaroor benoor ho jayega
_______________________________________________

मेरे ख़्वाबों की  बस्ती का सूनापन दूर हो जायेगा
तेरे छूने से मेरा ख़्वाबगाह   मशहूर हो जायेगा

जिन रास्तों से हम वाकिफ  थे , वो नज़र आते ही  नहीं
तू साथ चले तो नई राह का पत्थर कोहीनूर हो जायेगा

उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है मैंने अभी तक
तू भी सहरा पार जाने के लिये मजबूर हो जायेगा

कहाँ सोचा था हमने जब मोहब्बत का इज़हार किया था
कि जन्नत-ए-इश्क में गुम होना कसूर हो जायेगा

पाक मोहब्बत की  दुआ  में एक अजीब सी कशिश  है
मेरी  बेकसी का आलम आज ज़रूर बेनूर हो जायेगा

Tuesday, July 17, 2012

AB TO KAARSAAZ BHI NAHIN BOLTA / अब तो कारसाज़ भी नहीं बोलता .........

Aaina to humse jhooth kabhi nahin bolta
aur sach tumari tarah bhi nahin bolta

Is geele khushbudaar mitti  ko ilm hai judai ka
sau baar poochha humne,pataa fir bhi nahin bolta

Sailab hai yadon ka jisme dil aaj dooba hai
intihaan imtihaan ki,ab to kaarsaaz bhi nahin bolta

Darakhton ne to dekha hoga tumko ate hue
neem se poochha,aaj wo bhi nahin bolta

Poornamasi hai, purnoor hai mera aangan
aaj chaand ne haal poochha,waise kabhi nahin bolta

Is gahri mohabbat ke hum baagbaan hain
manzil door hai,yeh to mera dil bhi nahin bolta
____________________________________________

आईना तो हमसे झूठ कभी नहीं बोलता
और सच तुम्हारी तरह भी नहीं बोलता

इस गीली खुशबूदार मिट्टी को इल्म है जुदाई का
सौ बार पूछा हमने ,पता फिर भी नहीं बोलता

सैलाब है यादों का जिसमें दिल आज डूबा है
इंतिहां इम्तिहान की,अब तो कारसाज़ भी नहीं बोलता

दरख़्तों ने तो देखा होगा तुमको आते हुए
नीम से पूछा,आज वो   भी नहीं बोलता

पूर्णमासी है, पुरनूर  है मेरा आँगन
आज चाँद ने हाल पूछा,वैसे कभी नहीं बोलता

इस गहरी मोहब्बत के हम बागबान हैं
मंज़िल दूर है,ये  तो मेरा दिल भी नहीं बोलता

Monday, July 16, 2012

BICHHDA SAATHI / बिछड़ा साथी ..................

Bichhda saathi                                                                                                                          
milna mumkin                                                                                               
duniya gol..........................

बिछड़ा साथी 
मिलना मुमकिन 
दुनिया गोल ...........................
___________________________________________________________
Saalon pehle black mein ticket kharidi thi film ki
tez barish hui thi us din,chhatri bhi toot gayi thi

(kal bheege to darr laga,kahin beemar na padh jayen)


सालों पहले ब्लैक में टिकट खरीदी थी फिल्म की 
तेज़ बारिश हुई थी उस दिन,छतरी भी टूट गयी थी 

(कल भीगे तो डर लगा,कहीं बीमार न पड़ जाएँ )

_______________________________________________________________

Unki zabaan se jo nikla teer jaisa tha
Par hamein to dard sahne ki aadat hai................

उनकी ज़बान से जो निकला तीर जैसा था
पर हमें तो दर्द सहने की आदत है ...............................

BLACK BEAUTY...................

Sundori bola cholena kintu besh attractive
gayer rong ?well, black beauty
Oke na dekhle ini ,dishahara
jyano oi kore shob duty

Besh intelligent,jhagra korena
chupchap ak konai pore thake
Ki adbhut maya or dake
majhe moddhe ishara koreo dake

Shara khon hather muthoi achhe
hridoy jure achhe ,achhe pockete
Ami pashe thekeo jyano nei
o dekhi onar balishe atke

Nalish kore labh nei ,enar lifeline
o naki onnyotamo,jodio amar shotin
Ei bandhobir naam CELL PHONE
parbenna ini thakte chhere aktao din

blackberry.mobilephonesbrands.com


Saturday, July 14, 2012

GUWAHATI GIRL-ANOTHER ATROCITY.............

Another atrocity , another horrid video in circulation ,another bait for the audience , another scoop for the print media and ANOTHER REASON TO RETHINK .........................................................................

The Guwahati girl is just another news for the media ,be it print or electronic.The TRPs have definitely rocketted at the cost of someones misery and who cares? The girl was molested in full public view for half an hour and no one protested leave alone beat the hooligans.We talk about fighting terrorism,hanging Ajmal Kasab blah blah.............what about these terrorists who are roaming scotfree in our society and making a mockery of the Law and Order ??
Why only women ,I feel even the men are not safe in this city and in our country in general.The clan of anti-social elements is huge and increasing.What is more appalling here is the attitude of the media ,which needs to go  for some serious introspection.The crew which recorded the whole incident justifies its action with the logic that not recording it would have left the girl and her guardians with no evidence.

TWO QUESTIONS-------
a) Does it take half an hour to click someones picture if the sole purpose is that of gathering an evidence?
b)If they had recorded the whole scene to help the girl ,then why did they not maintain the secrecy of the evidence rather than circulating it in the various news channels and social networking sites?

We often talk about equality and parity but all that is theoritical.Whenever an incident like this is highlighted ,fingers start pointing towards the female involved in the whole ordeal.Take for example the Park Sreet rape case.As if it was normal for a woman who frequents nightclubs to be raped,and till date we do not even know whether the actual culprit has been nailed or not.Who is bothered? Those who had to make money by selling that news were successsful,and we the public were happy discussing it during some quality family time.
Another day,the newshungry people get Pinkt Pramanik to talk about.And now this Guwahati Girl.Life goes on and we keep reading and go on watching till a day comes and some girl from our family is tortured or molested or raped in a full public glare.And that is when we realise the embarrasment and the emotional stress that the families of such victims suffer at the hands of police and our honourable judiciary.

I want to strongly make a statement that punishment for these rogues and rapists should be no different than that of the terrorists-THEY SHOULD BE HANGED .........................................................................

Thursday, July 12, 2012

IS SHE A 'SHE' ?? WHO DECIDES ??

When media decides to weave a distasteful story and feed us what are we ,the so called commoners supposed to do?Keep mum like mommas best child or react in every possible way ? I am using the word react because revolt,according to me is a very strong word .PINKY PRAMANIK AN ATHLETE......... and the rest ,we all know.Read today,she has been released on bail after spending almost a month in the lock up.

Pinky is apprehensive about getting back her job with the railways.Her social life is definitely  going to suffer as our very eminent media has ghastly tarnished her image.Nobody has the right to publicize her anatomical detais and genetical findings  in such a disgraceful manner.Each and every individual is entitled to his /her right to privacy and hers has been encroached and how !!
All this while,that for almost a month she was not allowed to narrate her side of the story,or may be that was not made public. Media is very clever ,knows the appetite of its readers.Media calculated pretty well that Pinki Pramanik is not a sensitive person but a very sensitive issue which can supply fodder to the insatiable public at least for a week.As I fall into the bracket of AAM ADMI  I would also like to presume that this issue  was deliberately made a front page news to divert our attention from the more serious issues.Must have given our esteemed politicians an opportunity to buy time because the next volley of questions is going to be on the water logging and poor sewerage disposal in the city .

Coming back to the point, the mysterious part of the story is the charge itself..The player has been accused of a rape charge.I fail to understand how could the other woman,her friend ,  level such a horrendous charge against her after spending three years with Pinky under the same roof? Pinky says that her friend had stolen a gold chain and had threatened to circulate her nude pictures if she did not cough up twenty lakh !!

 I am addressing Pinki as HER because that is what SHE prefers.this is not her fault if she was born with some anomalies , many of us are.That said ,why dont we appreciate her for the fact that she did not sit at some corner of her home cribbing and cursing her fate and instead channelised all her energy towards a particular sport.

As of now we do not know who is right or who is wrong however media had a very responsible role to play and they failed,the whole story was in a very  bad taste . Further, to add to our dismay, the research department,doctors ,the lawyers and the police department who usually work in tandem in such cases and are not supposed to let out the details till they reach something conclusive ,also acted in an extremely irresponsible manner.

Its good to know that Pinkis father Sri Durgacharan Pramanik and Ms Jyotirmoyee Shikdar,a former athlete have extended their full support to the girl.Who knows ,this could be a well planned ploy to queer her pitch.......not very uncommon in an arena like this.........DO NOT FORGET THAT PINKY WON A GOLD MEDAL FOR INDIA AT THE ASIAN GAMES .............................................................................................................................

Tuesday, July 10, 2012

HOME DELIVERY..........

Fast food ,junk food , food court ,the much hyped pizza,KFCs ,McDONALDs - the list is endless and honestly I am not even aware of  most of these . Children sometimes use the term 'downmarket' if  you are not in sync with the latest trends or  will probably think  that you belong to the era of Dinosaurs . I have to confess though that these dishes are all taste bud friendly and has made our lives easy. To prepare an evening snack or a scrumptious meal is in no way a herculean task for the mothers anymore.How many tmes do we try to refrain ourselves from ordering  a pizza or some chinese delicacy? And how many times do we fail to stop our children from doing so? Kneading flour,then frying pooris,chopping vegetables to make a sabzi to accompany it ,so time taking and cumbersome if compared with the food that is just a phone call away,is not it?
Till a few years ago even I did not complain a bit if I had to prepare a range of starters and a full course meal in a short notice.That used to be a happy affair instead as the prospect of earning compliments for the effort would automatically lessen all the pain associated with the process.
The scenario has drastically changed over these last few years. The sprouting of umpteen number of fast food joints and the promptness of the home delivery service  provided by the same has made life easy.
But at what cost? What about our health? What about the various diseases like juvenile diabetes and obesity which is plaguing the younger generation of our country?How many kids are physically fit nowadays?And the most important of all, are we really worried? As parents ,are we not supposed to lead by an example?
Every magazine ,every daily has one or two article on health isues.Some are good whereas some too preachy but who is following them ! It would be wrong of me to generalize this approach but the opinions are always formed based on the behaviour of the majority.
Our mothers and grandmothers also did multitasking,raising more than one child(in most of the cases),sometimes in  a joint family sometimes alone,but without any complaints.Some of them did not even have access to luxury such as gas ovens.There were no refrigeraters which meant cooking each meal separately and spending long hours in the kitchen.they did it and with a smile.
We are blessed to have gadgets like fridge,microwave,OTGs etc to make our life hassle free but has it actually made it so?
To face the challenges of life one needs vigour and  a fit body along with an alert mind.this is not possible without changing our lifestyle and eating habits. I would like to confess that I make a resolution every morning and break it soon after the breakfast.but it has to change. I have to make sure that my son is eating the right kind of food including vegetables before its too late. The patience and energy level that my mother and grandmother were endowed with is definitely in my genes . This is not just my problem but of many I am sure.The dilemma is whether to live life the easy way where the comfort is just a phone call away or go back to the kitchen and work hard for the betterment of future!!!!!!!


Monday, July 09, 2012

BETIYAAN - PARAYA DHAN !! / बेटियाँ - पराया धन !!

आँसूं बह रहे हैं देखो ,कोशिश किये बिन
शहनाई  और मौसिकी,गुलशन सा सजा  आँगन

बाबुल देखो लोग कह रहे , मैं  हूँ अमानत उनकी


शादी के बाद बेटियाँ पराया धन कहलाती  हैं....क्या कोई जानता  है किसने कहा था ये? एक शरीर एक स्थान  से दूसरे स्थान चला गया इसका मतलब पराया हो गया?आज कितने दिन महीने गुज़र गए हैं ,मैंने अपनी एक अलग सी दुनिया बसा ली है.मेरे इस छोटे से सुसज्जित घोंसले में मैं अपने पति और बेटे के साथ बहुत खुश हूँ.पर जब भी मेरी तबियत खराब होती है मुझे माँ  की याद आती है, गरम तेल का छींटा हाथ पे आकर गिरता है और  कोई नहीं होता जब  आसपास, जो बरनौल  लगा दे ,तब माँ की याद आती है,पिताजी से एक आईसक्रीम माँगती थी तो दो लाकर देते थे.तब कभी मैंने ये सोचा ही नहीं की वो अपने हिस्से की आईसक्रीम मुझे दे रहें हैं .

आज जब ये बातें मुझे समझ में आ गयी हैं तो मैं निरुपाय  हूँ.ऐसा नहीं की मैं किंकर्तव्यविमूढ़  हूँ,मैं उनसे बहुत दूर हूँ.किसीने कमरे से आवाज़ लगायी चाय बनाओ और मैं दौड़ कर  रसोईघर चली गयी ऐसा अब नहीं हो सकता.जिस दिन मेरी विदाई थी विभिन्न प्रकार के रोने के स्वरों में से छन के एक बात मेरे कानों तक पहुंची थी "कल से सुबह की पहली चाय कौन बनायगा?"रोज सुबह जब  चाय -कॉफी बनाती हूँ यह  प्रश्न ज़हन में हलकी सी ठक-ठक  करता  है .

मेरा बेटा जब अपने दोस्तों के साथ खेलता है मुझे बाबुल के घर बिताए बचपन के दिन याद आते है,उनके झगड़ों   में मैं अपना बचपन ढूँढती हूँ.जब दो भाई बहन खेलते हैं या झगड़ते  हैं मुझे अपने भाई बहन याद आते हैं.क्या मैं सचमुच परायी हो गयी हूँ?एक देह के स्थानांतरण से किसी चीज़ से लगाव कम नहीं होता इसका प्रमाण है मेरा हर पल ,हर छोटी सी घटना में स्मृतियों  का उमड़ के आना.
बचपन में किसने गुड्डे गुड़िया  का खेल ना खेला होगा! आज बार्बी से खेलते हैं हम तो रुई और पुरानी  साड़ियों से गुड़िया बनाते थे.उनके कपड़े सिलते थे.जब उनकी शादी होती थी माला में फूल भी खुद ही पिरोते थे .तब शायद समझते नहीं थे,सुई धागा हाथ में लिए माला पिरोने के लिए बेताब हमारा निष्पाप मन असल में उन सुनहरे पलों को ही तो पिरोता था.मैं तो आज भी उन जुही और गेंदे के फूलों की महक महसूस कर सकती हूँ.

विवाहपूर्व जितना भी समय हम स्त्रियाँ अपने मायेके में गुजारती हैं उन अनगिनत पलों का महत्व वास्तव में हम विवाहोपरांत ही समझ पातीं  हैं.माँ बाप किस प्रकार कठिन आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद हमारी मुस्कान  की  खातिर हमारी इच्छाओं  को पूर्ण करते थे ये हम तब समझ पातीं  है जब खुद माँ बनती हैं.
मैं तो आज भी जब कोई कविता लिखती हूँ तो अपनी माँ से ठीक उसी बचपन वाली उत्सुकता से पूछती हूँ की उन्हें कैसी लगी .मैं  तो उनकी नज़रों में बड़ी हुई ही नहीं और ना होना चाहती  हूँ.
हम सबके भीतर  एक बच्चा है,उसे ज़िंदा रखना बहुत ज़रूरी है.अपने बच्चों को भी समझने के लिए हमें कई बार बच्चा बनना पड़ता है,बच्चों के साथ बच्चा बन जाने से उनकी  भावनाओं को समझना आसान हो जाता है .मेरी माँ भी तो ऐसा ही करती थीं ,मुझे समझने की कोशिश,पूर्ण धैर्य के साथ.बचपन में डाँट खाना ,मार खाना  सब स्वाभाविक है अगर सीमा उल्लंघन ना कर जाये तो.लिखते लिखते एक और बात याद आ गयी.मा जब डाँटती थीं तो रूठ कर मैंने उन्हें सौतेली भी कहा था.आज मेरा  बेटा ठीक यही अपशब्द कहता है जब मैं अपना धीरज खो बैठती हूँ.बहुत अचरज होता है!!

मेरे अपरिपक्व मस्तिष्क में इतनी क्षमता नहीं थी कि माँ के गुस्से का कारण समझ सकूं या उसके उत्पत्ति का स्त्रोत ढूँढकर समस्या का निदान कर सकूं.आज बहुत देर हो गयी है. वो अक्सर कहतीं थीं -'जब खुद  माँ बनोगी तब समझोगी माँ बनने की पीड़ा  क्या होती है'.
कहते हैं ना हर अच्छे वस्तु का मूल्य  उसके टूट जाने पर या छिन जाने पर ही ज्ञात होता है.माँ का प्यार भी एक ऐसा अमूल्य खज़ाना है.बेटियाँ कभी परायी नहीं होतीं.वास्तव में विवाह के पश्चात ही माँ और बेटी का रिश्ता मज़बूत  बनता  है.अपने जिस बाबूजी से वो शादी से पूर्व डरी सहमी रहती थी,कन्यादान के वक्त उसी पिता के आँसूं उसे उम्रभर  के लिए एक अदृश्य एवं मज़बूत धागे से बाँध देते  है.
भाई बहिन में अब झगड़े नहीं होते,बल्कि ससुराल में कोई कष्ट दे  तो बहिन की रक्षा करने भाई  दौड़ा चला आता है .

खुशनसीब होती हैं ऐसी बेटियाँ जो अपने संसार धर्म से वक्त निकाल कर ,गुरुजनों की सेवा करने में सक्षम होतीं  हैं.जो सेवा  नहीं कर पातीं वो भी बदनसीब नहीं होतीं.उनकी पूजा अर्चना और दुआ में उन्हें जन्म देने वाले ये दो अतीव सुन्दर मनुष्य अवश्य रहते हैं..........................

Friday, July 06, 2012

MOTHERHOOD..../.....মাতৃত্ব

pic-google
Jakhon ami chhoto chhilam........

Ma rege gele bolten "akta amon maar debo na mukher geography palte jabe"......
amra du bhai bon henshe boltam-'geography na mummy map'....ar paliye jetam..
Aaj nijer chhele ke bokte giye theek ei shabdo gulo anayashe mukh theke beriye porlo.
Moner ak konai proshno uthlo 'ki kore'?

Kichhutei garom bhaat makhte partamna,ma ke boltam 'mekhe dao,deri hoe jachhe'..
Aaj amar chhele jakhon aki katha bole,ami sundor kore shoddo namano bhaat ta mekhe di,ektuo kashto hoina, ashole mone hoi--------mekhe na dile chhele ta na khei uthe jabe.........amar mao bodhoi tai bhabto....

Ma hole jibon ta palte jai eta aaj theke choddo bachhor agei ter peyechhilam.......
Aaj proti ta muhurto amake aktai katha shekhai je ma hoa khub akta kothin byapar na. Shudhu paoar asha na rekhe diye jete hobe,nijer hajar kashto holeo santaner mukh che shei kashto ta shojjhyo kore jete hobe....EKEI BODHOI MA ER MAMATA BOLE...............

Thursday, July 05, 2012

MY HUSBAND TO ME.................

1 .(FB-11th APRIL)---- Walking the first few steps after almost 50 days of confinement brought immense relief & a realization. Its been 15 years of my marriage & somewhere the companionship had taken a back seat to compatibility but during the last two months, I realized what it takes to be a 'soul-mate'. My emotions have been handled with so much of affection and relentless care that I have no words to express my feelings for you. Words like 'grateful' and 'thanks' are not for you, my dear wife.I have not said these words for many years now, but let me this time.. I love you my dear
2 . (FB-5th JULY)---- you seem to be consistently excelling in the art of composing excellent verses every day. must say, each of your composition have become a benchmark by themselves, to be bettered in the next. please keep writing! its a pleasure and a pride.

LOVELESS MARRIAGE OR DIVORCE ??

LOVELESS MARRIAGE OR DIVORCE
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
Nari manei ki shudhu abola?
anek ke jani jara bhenge porena
Bhangte jane baandh
joar er shathe bheshe jaina
Plabito nodi dai oder shahosh
bonnya ke joy kore egiye jai kato
Mon ke tara boshe korechhe
chancholota drirotar kachhe nato
Ora jakhon bhalobashe kaoke
akash ar samudra tader prerona hoi
Jakhon bhalobasha aghaat paye
bhenge porena,paina kaoke bhoi

Roughly translated, my poem means, there are women who are brave enough to face the challenges that life,love or for that matter marriage brings forth.They have learnt to control their feelings and emotions ,which is a very difficult thing.The vastness of the sky and the depth of the sea is the limit when they decide to fall in love.But these same set of women are unabashed when their love leaves them,leaving them alone to face the social police.They know how to stand alone at the face of adversity.................
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

Every love story does not culminate into a  happy ending,Similarly,each and every marriage irrespective of it being an arranged or love ,does not end up being a cherished bond till both the partners decide to face the challenges and upheavals of life together with an equal zest.This is ideally what a marriage should be all about but how many marriages are actually theoritically and practically similar?IN reality mostly , the onus is  unto us women to keep working towards the strenthening part.However the efforts are seldom appreciated,rather they are perceived to be some kind of weakness.Those who earn ,have choices and  opportunities to look beyond the boundaries.Those with no such luck cannot retaliate when taken for granted.This is of course a very personal view,and I have complete respect for those who would like to differ................
But ,a very pertinent question---Do most of us still think loveless marriage is better than divorce?

Someone very close to me is going through this phase where she is unable to decide whether to accept her husband or to divorce him .She is confused as she has a five year old who is fond of his father,she is not independent and her parents want her to patch up despite knowing the waywardness of her husband.
What is more ironical here is the impertinent and nonchalant manner of  her husband.Behaving as if he has not committed any heinous crime by getting involved,quite seriously ,with another woman.

This is not the story of this one woman ,there are many on the same boat.Some have chosen to accept their fate as it comes,some have had luck on their side and got an opportunity to begin their life anew.
Coming back to the point, that is  my poem,yes ,I do know some women,who are fighting it out on their own.Are they happy?Who knows! Why only women,I think even men do not fancy loneliness .......but at the end of the day what matters utmost is ones peace of mind.............

When I look at my two maids,I am extremely amazed although not inspired.They are the most independent women on earth I reckon.Their husbands did not leave them ,rather they left their husbands.One of them actually threw her husband out of the house,the husbands in both the cases were drunkards and spendthrift and spent the hard earned money of their wives on their mistresses....Ido not see any diminished zeal for life in these two females, neither are they bothered about the society and its norms.They earn and spend on whatever and however they want.

Would I be able to do the same when put in a  similar situaton? NO.I do not have the guts.I belong to that category where divorce is the last resort or no option at all.A child needs both the parents even if they are not compatible that is what I personally believe.But then incompatibily,violence etc can marr the innocence of  a child and in such cases it is often sane to separate rather than pushing the child into further compexities.Having said that ,if couples are ready to give their relationship a second chance,having both the parents around, works as an invisible canopy for the child/children. A stress free life is what matters most in this competitive world for our children.................................


www.flickr.com

Wednesday, July 04, 2012

HAIKU / हायकू


बैण्ड वाले हैं
इतना शोर-गुल
नेता या दुल्हा ?

band wale hain
itna shor gul
neta ya dulha

महंगाई है
सपने मत बुन
टूट जायेंगे

mahangai hai
sapne mat bun
toot jayenge

गरीबी  नर्क
दिल से जो गरीब
पैसा मैल है

gareebi nark
dil se jo gareeb
paisa mail hai

खुशियाँ क्या हैं
दुखांत ,कष्ट नहीं
 दुर्लभ पाना

khushiyaan kya hain
dukhant, kasht nahin
durlabh pana

दोस्ती की गाँठ
कितनी मज़बूत
वक्त वकील

dosti ki gaanth
kitni mazboot
waqt wakil

जीवन नदी
हम तुम नाव हैं
पार कर लें

jeevan nadi
hum tum naav hain
paar kar le

मझधार मैं
विशाल नदी और
माझी के गीत

टिप टिप ये
बरसता है पानी
आँसू या वर्षा ?

tip tip ye
barasta hai pani
aansoon ya varsha?

तर्कवितर्क
फिर भी तेरा  साथ
यही जीवन

tarkvitark
phir bhi tera saath
yahi jeevan

प्लावित मन
भावनायें असीम
समय कम

plavit man
bhavnayein aseem
samay kam


Tuesday, July 03, 2012



Ye badal fir pareshan karne lage hain
pareshani mein hum uljhe ja rahe hain
chhaye hue hain kabse baraste hi nahin
dillagi kar rahe hain,ye khud unhe hosh nahin 
chhaye the aise jaise fat padega aasman
kali chadar mein lipti hai suraj ki muskaan
pankh hote to udaan bharti,kahti 'aaj barso'
'zindagi ko thoda aur roomani bana do '..............

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

ये बादल फिर परेशान करने लगे 
हैंपरेशानी में हम उलझे जा रहे
 हैंछाये हुए हैं कबसे बरसते ही नहीं 
दिल्लगी कर रहे हैं,ये खुद उन्हें होश नहीं
छाये थे ऐसे जैसे फट पड़ेगा आसमानका
ली चादर में लिपटी है सूरज की मुस्कान 
पंख होते तो उड़ान भरती,कहती 'आज बरसो''
ज़िंदगी को थोड़ा और रूमानी बना दो '..............
Ek aur kist,silsila jari rahega agle dus saalon tak
zindagi ki ahmmiyat nahin samajhte the,beema karwa liya tha

pandrah saal guzarr gaye ,hum saath hain..............

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

एक और किस्त ,सिलसिला जारी रहेगा अगले दस सालों तक
ज़िंदगी की अहम्मीयत नहीं समझते थे,बीमा करवा लिया था 

पन्द्रह साल गुज़र गए , हम साथ हैं ...........................

SOME OF MY FAVOURITE POSTS

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...